
Gen Z Behavior: डिजिटल युग में पले-बढ़े होने के सामाजिक प्रभावों के कारण जेन Z के लोग रूखे या असभ्य लग रहे हैं – डॉ. एम. वसी बेग
‘जेन Z’ के लोगों के व्यवहार में जो रूखापन दिखता है, वह अक्सर जानबूझकर की गई बदतमीजी नहीं होती, बल्कि यह सांस्कृतिक मानदंडों, बातचीत के तरीकों में अंतर और डिजिटल दुनिया में पले-बढ़े होने के सामाजिक प्रभावों का नतीजा होता है। डॉ. एम. वसी बेग के अनुसार, Gen Z Behavior को समझने के लिए नई पीढ़ी की सोच, डिजिटल आदतों और बदलते सामाजिक परिवेश को समझना जरूरी है।
इस धारणा के पीछे पांच मुख्य कारण हैं:
1. सम्मान की अलग-अलग परिभाषाएं
पुरानी पीढ़ियां अक्सर सम्मान का मतलब आज्ञा मानना, बड़ों या अधिकारियों का आदर करना और औपचारिक शिष्टाचार (जैसे सम्मानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना या छोटी-मोटी बातचीत करना) समझती हैं। वहीं, ‘जेन Z’ के लिए सम्मान का मतलब आपसी और बराबरी का रिश्ता है। वे दिखावटी या पदानुक्रम (hierarchy) पर आधारित शिष्टाचार के बजाय ईमानदारी और सीधी बात को ज्यादा अहमियत देते हैं।
2. डिजिटल बातचीत की आदतें
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच पले-बढ़े होने के कारण ‘जेन Z’ के बातचीत करने का तरीका बदल गया है। कॉल करने के बजाय मैसेज करना, अनौपचारिक जवाब देना (जैसे “यू आर वेलकम” की जगह “हां” या “नो प्रॉब्लम” कहना), या फोन उठाते समय बिना कुछ बोले सुनना—ये सब काम को जल्दी और आसानी से निपटाने के तरीके हैं। हालांकि, पुरानी पीढ़ी के लोग अक्सर इसे रूखापन या दूसरों को अनदेखा करने जैसा मान लेते हैं।
3. “जेन Z स्टेयर” (Gen Z Stare)
बातचीत के दौरान लंबी खामोशी या कस्टमर सर्विस जैसी स्थितियों में बिना किसी भाव के एकटक देखते रहना—इसे अक्सर ‘खराब रवैया’ मान लिया जाता है। कुछ युवा ऐसा दिखावटी सकारात्मकता से बचने, अपनी मानसिक ऊर्जा बचाने या अपनी निजी सीमाओं (personal boundaries) की रक्षा करने के लिए करते हैं।
4. महामारी और स्क्रीन का प्रभाव
कोविड-19 महामारी और विकास के महत्वपूर्ण वर्षों के दौरान स्क्रीन पर बहुत अधिक समय बिताने की वजह से कई युवाओं को आमने-सामने बातचीत करने का मौका कम मिला। इस कारण वे सामाजिक मेलजोल में असहज महसूस कर सकते हैं या उन्हें सामान्य बातचीत (small-talk) करने में कठिनाई हो सकती है।
5. मानसिक स्वास्थ्य और निजी सीमाओं को प्राथमिकता
‘जेन Z’ के लोग केवल समाज को दिखाने के लिए दिखावा करने या अपनी भलाई की कीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं होते। बिना किसी अपराधबोध के “ना” कहना, अपनी स्पष्ट सीमाएं तय करना या किसी खराब (toxic) माहौल से बाहर निकल जाना—पुरानी पीढ़ी के लोगों को, जो आपसी तालमेल और समझौते के माहौल में पले-बढ़े हैं, यह सब स्वार्थ या बदतमीजी जैसा लग सकता है।
निष्कर्ष
डॉ. एम. वसी बेग के विचारों के अनुसार, नई पीढ़ी के व्यवहार को केवल रूखापन या असभ्यता के नजरिए से देखना उचित नहीं है। बदलती तकनीक, सामाजिक परिस्थितियां और पीढ़ियों के बीच संवाद के अलग-अलग तरीके इस धारणा को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में आपसी समझ, सम्मान और बेहतर संवाद के जरिए पीढ़ियों के बीच की दूरी कम की जा सकती है।
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