नई दिल्ली, 18 अगस्त 2026
Unmarried Women India: भारत में अधिक से अधिक महिलाएं शादी न करने का फैसला ले रही हैं। यह सिर्फ करियर की महत्वाकांक्षा तक सीमित नहीं है। नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस के आंकड़ों के अनुसार, अविवाहित महिलाओं का अनुपात 2011 में 13.5% से बढ़कर 2021 में 19.9% हो गया है।

यह आंकड़ा यह नहीं बताता कि सभी महिलाओं ने जानबूझकर शादी को खारिज कर दिया है, लेकिन यह साफ संकेत देता है कि कई महिलाओं के लिए शादी अब पहले जैसी रफ्तार या उम्र में नहीं हो रही। कुछ महिलाओं के लिए अपनी कमाई ने शादी का आर्थिक दबाव कम कर दिया है। कुछ के लिए घर के कामों का असमान बंटवारा, मातृत्व की अपेक्षाएं और करियर की स्वतंत्रता खोने की चिंता ने उन्हें सावधान बना दिया है। और कुछ महिलाओं को लगता है कि सुरक्षित और संतुष्ट जीवन के लिए शादी जरूरी नहीं है।
महिलाओं में बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता
इस बदलाव का एक बड़ा कारण यह है कि अधिक महिलाएं शादी से पहले अपना आर्थिक आधार मजबूत कर रही हैं। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2021-22 के अनुसार, उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन 1.57 करोड़ से बढ़कर 2.07 करोड़ हो गया है। महिला ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो भी 22.9% से बढ़कर 28.5% हो गया।
उच्च शिक्षा का मतलब यह नहीं कि महिला शादी नहीं करेगी। लेकिन इससे महिलाओं को शादी से पहले अधिक समय, आय और विकल्प मिलते हैं। ऐसे में शादी आर्थिक सुरक्षा का साधन कम और जीवन में मूल्य जोड़ने वाला रिश्ता ज्यादा बन जाती है।
घर के अंदर दूसरी शिफ्ट
पैसे ही पूरी कहानी नहीं हैं। काम से घर लौटने के बाद घर का काम कौन करता है? भारत के टाइम यूज सर्वे 2019 के अनुसार, महिलाएं घरेलू कामों पर औसतन 299 मिनट प्रतिदिन खर्च करती हैं, जबकि पुरुष सिर्फ 97 मिनट। देखभाल संबंधी कामों में भी महिलाएं 134 मिनट और पुरुष 76 मिनट देते हैं।
जब महिला शादी के बारे में सोचती है तो यह अंतर मायने रखता है। नौकरीपेशा महिला के पास पूरा काम होता है, फिर भी शादी के बाद खाना बनाना, सफाई, बच्चों की देखभाल और ससुराल की जिम्मेदारियां उसी पर आने की उम्मीद रहती है। जो महिलाएं इस व्यवस्था को नहीं चाहतीं, उनके लिए अविवाहित रहना आसान लग सकता है।
महिलाएं अब समझौता कम करने को तैयार

महिलाएं अब पार्टनर से क्या उम्मीद रखती हैं, इस बारे में भी साफ हो रही हैं। 2024 के एक डेटिंग सर्वे के अनुसार, 64% महिलाएं पार्टनर से अपनी जरूरतों और अपेक्षाओं को लेकर अधिक निश्चित हो रही हैं और समझौता करने को कम तैयार हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि महिलाएं रिश्ते नहीं चाहतीं। इसका मतलब है कि रिश्ते में प्रवेश का मानक बदल रहा है। अगर शादी में लगातार समझौता, असमान जिम्मेदारियां या स्वतंत्रता का नुकसान हो तो कई महिलाएं अब उसे सिंगल रहने से बेहतर नहीं मानतीं।
शादी अब देर से हो रही है
जल्दी शादी में कमी भी इस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन के अनुसार, 20-49 आयु वर्ग की महिलाओं में पहली शादी की औसत उम्र 1992-93 में 16.2 साल से बढ़कर 2019-21 में 19.2 साल हो गई है। 20-24 आयु वर्ग की उन महिलाओं का अनुपात जो 18 साल से पहले शादी कर चुकी थीं, 66% से घटकर 23.2% रह गया है।
शादी देर होने से महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्र जीवन जीने का अधिक समय मिलता है। और एक बार शादी टलने के बाद, महिलाएं बेहतर तरीके से तय कर पाती हैं कि वे इसे चाहती भी हैं या नहीं।
“बाद में तुम्हारा ख्याल कौन रखेगा?”

अविवाहित रहना आर्थिक रूप से कुछ महिलाओं के लिए आसान हो गया है, लेकिन सामाजिक रूप से अभी भी जटिल है। परिवारों का सबसे आम सवाल होता है — बाद में तुम्हारा ख्याल कौन रखेगा?
लेकिन कुछ महिलाएं इसके लिए भी तैयारी कर रही हैं। वे पति और बच्चों पर निर्भर रहने की बजाय बचत, संपत्ति, स्वास्थ्य योजना और करीबी दोस्तों के सहारे सोच रही हैं। “चोजेन फैमिली” का आइडिया भी धीरे-धीरे उभर रहा है, जहां करीबी दोस्त भावनात्मक और व्यावहारिक सहारा बनते हैं।
सिंगल का मतलब अकेला नहीं
शादी के दबाव के पीछे यह धारणा है कि अविवाहित महिला जरूर कुछ खो रही है। लेकिन जो महिलाएं सिंगलहुड चुनती हैं, वे अक्सर अलग प्राथमिकता बताती हैं — वे अपने समय, पैसे, घर और करियर पर नियंत्रण चाहती हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि वे प्यार या साथ नहीं चाहतीं। कुछ लंबी अवधि के रिश्ते चाहती हैं लेकिन शादी में जल्दबाजी नहीं। कुछ सिंगल रहकर खुश हैं। कुछ बच्चे चाहती हैं लेकिन शादी को उसकी शर्त नहीं मानतीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ये फैसले अब खुलकर चर्चा में आ रहे हैं।
निष्कर्ष
Unmarried Women India अब सिर्फ समस्या नहीं, बल्कि एक जीवन विकल्प बनता जा रहा है। महिलाएं शादी कर भी सकती हैं, देर से कर सकती हैं, बहुत सोच-समझकर पार्टनर चुन सकती हैं या बिल्कुल नहीं कर सकतीं।
बड़ा बदलाव यही है कि “अविवाहित” होना अब सिर्फ एक अधूरा अध्याय नहीं, बल्कि कई महिलाओं के लिए सचेत जीवन चुनाव बन गया है।
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